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नो फादर्स इन कश्मीर रिव्ह्यु – दो टीनएजर्स के नज़रिए में दर्शाई गई खूबसूरत वादियों की गंभीर वास्तविकता

Release Date: 05 Apr 2019

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Keyur Seta

अश्विन कुमार निर्देशित इस फ़िल्म की कहानी कश्मीर के गुमशुदा पतियों के इर्द गिर्द घूमती है।

अश्विन कुमार की फ़िल्म नो फादर्स इन कश्मीर का शीर्षक ये अंदेशा करता है के ये इन वादियों में खोए हुए लोगों की बात करता है। पिछले कई वर्षों में हज़ारो लोगों को सुरक्षा दलों द्वारा पूछताछ के लिए उठाया गया है, जिनमें से कई लोग वापस नहीं आए। वर्षों बाद भी परिवार को ये नहीं पता के उनके घर का आदमी ज़िंदा भी है या मर गया। इसी बीच बच्चें बिना बाप के ही बड़े हो रहे हैं।

ज़ेनब (नताशा मागो) के पति को कई वर्ष पहले पूछताछ के लिए बुलाया गया था। उसके बाद पति का कोई ठिकाना न मिलने पर वो बेटी नूर (ज़ारा ला पेटा वेब्ब) के साथ लन्दन चली गई। वर्षों बाद वो अपने सास-ससुर (सोनी राज़दान और कुलभूषण खरबंदा) के पास कुछ कानूनी औपचारिकता पूरी करने आयी है। नूर अब १४ वर्ष की हो गई है।

जहाँ एक तरफ फ़िल्म कश्मीर के गुमशुदा इंसानों के विषय को छेड़ती है, वहीं दूसरी ओर वहाँ की अँधेरी दुनिया का भी दर्शन फ़िल्म के माध्यम से होता है। कथासूत्र धीरे धीरे नूर की इस जगह को लेकर बदलती धारणा पर आता है।

कश्मीर में आने से पूर्व उसे वहाँ के हालात के बारे में कोई अंदाज़ा नहीं है। उसके लन्दन का दोस्त उसे मज़ाक में ये भी कहता है के किसी टेररिस्ट के साथ एक तसवीर ले लेना और नूर भी उस पल के इंतज़ार में है।

नूर उसी के हमउम्र माजिद (शिवम रैना) से मिलती है, जो उसके पिता के दोस्त का बेटा है। दोनों दोस्त बन जाते हैं। माजिद के पिता भी ऐसे ही उठाए गए थे और फिर कभी वापस लौट कर नहीं आए। धीरे धीरे नूर को वास्तविकता का पता चलता है और फ़िल्म का नूर भी धीरे धीरे बदलता है।

इन सारे हालातों में भी दोनों टीनएजर्स की अपनी ही एक अलग दुनिया बन जाती है। पर वे तभी तक उस दुनिया में जी पाते हैं जब तक हालात उन पर हावी नहीं हो जाते।

नूर और माजिद का रिश्ता आपके दिल में उनके लिए एहसास जगाता है। दोनों का वास्तविक अभिनय आपको उनके रिश्ते में खिंच लेता है। रैना कश्मीर के लोकल बच्चे के रूप में आश्वासक लगते हैं, जिसे वहाँ की परिस्थितियों का पूरा अंदाज़ा है पर फिर भी वो खुश रह सकता है।

अपने पिता की सच्चाई जानने के लिए बेताब नूर की भूमिका में वेब्ब अच्छा प्रदर्शन करती है। उनके किरदार की ताकत कुछ छोटे क्षणों में पता चल जाती है जब वो खिड़की तक चढ़ने के लिए माजिद की मदद लेने से इन्कार करती है।

नो फादर्स इन कश्मीर में वहाँ की परिस्थितियों का गंभीर चित्रण नज़र आता है, जो कश्मीर के दृश्यांकन में भी दिखता है और फ़िल्म के किरदारों में स्पष्ट होता है। अश्विन कुमार ने यह भी दर्शाया है के कैसे वहाँ के लोकल आतंकी बन जाते हैं और आज़ादी की मांग करते हैं, जब वो या उनके परिवार जन सुरक्षा कर्मियों का शिकार बन जाते हैं। शायद भारत के किसी और क्षेत्र के लोगों को ये बात हज़म होना मुश्किल हो सकता है।

अर्शिद नाम का एक किरदार इस कहानी में सबसे अलग लेकिन सबसे अधिक उभरकर आता है। वो नूर और माजिद के पिताओं का अच्छा दोस्त था। अर्शिद को भी पूछताछ के लिए उठाया गया था, लेकिन वो वापस आ गया। पर जो यातनाएं उसे कस्टडी में रहते हुए सहनी पड़ी उससे वो अलगाववादी हो गया। इस किरदार को निर्देशक अश्विन कुमार ने निभाया है और उन्होंने बेहतरीन काम किया है।

सोनी राज़दान और कुलभूषण खरबंदा अपनी छोटी भूमिकाओं में भी अपनी छाप छोड़ जाते हैं। नताशा मागो, अंशुमन झा और माया सराओ की अदाकारी भी प्रशंसनीय है।

नो फादर्स इन कश्मीर में कुछ खामियां भी हैं। जैसे के ज़ेनब की पूर्व कहानी में वो कैसे लन्दन गई और वहाँ पर दुबारा शादी करके स्थायी हो गई, इस बात की स्पष्टता उसकी कहानी में नहीं है।

ऐजाज़ ख़ाँ की हामिद (२०१९), दानिश रेंजू की हाफ विडो (२०१७) और प्रवीण मोरछले की विडो ऑफ़ साइलेन्स (२०१९) ये फ़िल्में भी सुरक्षा कर्मियों ने उठाए हुए गुमशुदा पतियों के बारे में ही हैं। पर हर फ़िल्म एक दूसरे से अलग है। फ़िल्म के किरदार और कश्मीर के हालात को हर फ़िल्म में अलग प्रकार से दर्शाया है। कश्मीर के विषय पर मिशन कश्मीर (२०००) जैसी फ़िल्मों से अलग बनती ये फ़िल्में एक अच्छा बदलाव है।

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