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मलंग रिव्ह्यु – प्यार, बदला और खून की क्लिष्ट थ्रिलर फ़िल्म

Release Date: 07 Feb 2020 / Rated: A / 02hr 14min

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Sonal Pandya

मोहित सूरी द्वारा निर्देशित इस फ़िल्म में प्यार और बदले के कई धागे जोड़ कर एक जटिल कहानी पेश की गयी है।

मलंग (२०२०) में आदित्य रॉय कपूर के किरदार का परिचय एक लम्बे टेक वाले एक्शन दृश्य से होता है, जहाँ वो जेल में बाकि कैदियों के साथ भीड़ जाता है, और जीतता है। अद्वैत ठाकुर की भूमिका में रॉय कपूर ने अपने शरीर को अच्छा खासा कमाया है। यह थ्रिलर ज़्यादातर ख्रिसमस की पूर्व संध्या पर घटता है, जब अद्वैत अपने शिकार को मारने निकलता है। पुलिस के स्पेशलिस्ट सेल के सदस्यों से अद्वैत अपना बदला पूरा करना चाहता है।

पर अपने मिशन पर निकलने से पहले वो इन्स्पेक्टर अंजनेय आगाशे (अनिल कपूर) को फोन करता है और अपनी योजना की सूचना दे देता है। जैसे जैसे दिन रात में तब्दील होता है, अद्वैत एक एक पुलिस अफसर (वत्सल सेठ, कीथ सिक्वेरा और प्रसाद जवादे) को मार देता है। एक और पुलिस अफसर, माइकल रोड्रिग्ज़ (कुणाल केमू), आता है और इन मर्डर्स के पीछे कौन है और ये मर्डर क्यों कर रहा है, इसके बारे में पता लगाने की कोशिश करता है।

कहानी पॉंच साल पीछे जाती है, जब साधारणसा अद्वैत गोवा की एक रेव पार्टी में सारा नाम्बियार (दिशा पटनी) से मिलता है। दोनों किसी मलंग की तरह जीवन बिताना चाहते हैं और ज़िंदगी को बिंदास तरीकेसे अपनाना चाहते हैं। दोनों तुरंत एक दूसरे को पसंद करने लगते हैं और दोनों कई एडवेंचर्स साथ करते हैं।

पर एक क्षण अद्वैत किसी ज़िम्मेदारी को स्वीकारने की मनस्थिति में नहीं होता, जिसका बाद में उसे पछतावा होता है। कुछ घटनाएं ऐसी घटती हैं के उसे गिरफ्तार कर लिया जाता है और ड्रग्स के मामले में उसे पॉंच साल की कैद हो जाती है। जब वो रिहा होता है, तो उसमे बदले की आग भरी हुई होती है।

सारा के साथ क्या हुआ ये बात उत्तरार्ध में खुलती है। पर असीम अरोरा की कहानी हो या अनिरुद्ध गुहा का स्क्रीनप्ले, सारे ट्विस्ट कोई ज्यादा चकित नहीं करते और उनका अंदाज़ा लगाया जा सकता है। साथ ही सूरी की ही एक विलन (२०१४) के कुछ अंश मलंग में भी देखने को मिलते हैं।

आदित्य रॉय कपूर एक गंभीर और शारीरिक मेहनत वाला प्रदर्शन करते हैं, जो अपने ध्येय के लिए दीवाना है। उनके प्रदर्शन में संजीदगी और ईमानदारी झलकती है।

अनिल कपूर एनकाउंटर स्पेशलिस्ट आगाशे के रूप में ज़बरदस्त फॉर्म में नज़र आते हैं। आगाशे ड्यूटी के वक़्त भी नशा करता है और अपने आसपास की परिस्थिति पर ठहाके लगा कर हसता है। पर कभी कभी ये भी ज़रूरत से ज़्यादा लगने लगता है। अफ्रीकन ड्रग पेडलर के साथ आगाशे का एक काफ़ी मज़ेदार दृश्य भी है।

कुणाल केमू माइकल की भूमिका में तीखे तर्रार नज़र आ रहे हैं। माइकल आगाशे पर कंट्रोल रखता है, जब तक परिस्थिति उसके हाथ से बाहर नहीं निकल जाती। कलंक (२०१९) की तरह यहाँ भी केमू अपनी भूमिका ईमानदारी से निभाते हैं। एली अवराम भी छोटी लेकिन महत्वपूर्ण भूमिका में हैं।

लन्दन से गोवा अपनी खोज में आयी सारा की भूमिका में दिशा पटनी अच्छी लग रही हैं, पर उनके किरदार को फ़िल्म में ज़्यादा कुछ करने को नहीं है। उनकी और रॉय कपूर की जोड़ी अच्छी लगती है और गोवा के सारे एडवेंचर्स में दोनी की जोड़ी खूब जचती है। विकास शिवरामन की सिनेमैटोग्राफी ऐसे दृश्यों में काफ़ी मनमोहक है, पर कई बार यूँ भी लगता है के गो-प्रो कैमरा का कोई ऍड शूट तो नहीं चल रहा।

कई जगहों पर फ़िल्म के किरदार ड्रग्ज़ का इस्तेमाल करते नज़र आते हैं और ऐसे समय सेंसर बोर्ड ने दी हुई चेतावनियॉं नीचे दिखती हैं जो के काफ़ी मज़ेदार हैं। 'मुर्ख मत बनो, ड्रग्ज़ दिमाग को ख़राब कर देते हैं', "ड्रग्ज़ मौत का रास्ता है' जैसी चेतावनी इन दृश्यों के साथ देखना कुछ व्यंग अपने आप तैयार कर देता है। 

सूरी की बाकी फ़िल्मों की तरह इस फ़िल्म में भी संगीत महत्वपूर्ण घटक है। 'हमराह' या बाकि गानों के द्वारा किरदार की मानसिक अवस्था स्पष्ट हो जाती है।

सूरी ने इस थ्रिलर से मेलोड्रामा के लिए अधिक जगह नहीं रखी है। इस गूढ़ कहानी को समझने की आपकी क्षमता के अनुसार आप इसे पसंद या नापसंद करेंगे।

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