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Review Hindi

हम चार रिव्ह्यु – दोस्ती के गहराई की सीधी और सरल कहानी

Release Date: 15 Feb 2019 / Rated: U/A / 02hr 23min

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Cinestaan Rating

  • Acting:
  • Direction:
  • Music:
  • Story:

Suparna Thombare

निर्देशक अभिषेक दीक्षित का लेखन एवं निर्देशन आश्वासक ज़रूर है, पर धीमी गती और लम्बाई की वजह से फ़िल्म खींची गयी है।

राजश्री प्रॉडक्शन्स की हम चार फ़िल्म ये चार मेडिकल विद्यार्थियों की कहानी है। नमित (प्रीत कमानी), सरजो (तुषार पांडे), अबीर (अंशुमन मल्होत्रा) और मंजरी (सिमरन शर्मा) ये चारो कैंपस में मिलते हैं और अच्छे दोस्त बन जाते हैं। पर एक घटना इन चारो की दोस्ती की परीक्षा लेती है।

मंजरी राजश्री प्रॉडक्शन्स की नए ज़माने की नायिका ज़रूर है पर यहाँ वो पितृसत्ताक परंपरा और बाकि रीती रिवाज़ो में दबी हुयी नहीं है।

मंजरी खुद के विचारों वाली विद्रोही युवती है जो सही और ग़लत को समझती है। अपने परिवारसे अपने हक्क के लिए उसे झगड़ना पड़ता है और उसका यही व्यवहार उसके स्वाभाव में भी झलकता है। डॉक्टर बनना ये उसका ध्येय है और इसलिए उसके पारंपरिक विचारों वाले पिता या भाई भी उसकी ज़बरन शादी करा नहीं सके हैं।

उसका निडर, स्वतंत्र और बेदरकारी स्वभाव तीनो युवकों को आकर्षित करता है।

एक महत्वपूर्ण दृश्य में मंजरी कहती है, "लड़कियों को लड़कों से नहीं उनके इंटेंशन्स से डर लगता है।" पर फिर भी वो इन तीनो लड़कों को अपने जीवन में प्रवेश करने देती है और चारों सबसे अच्छे दोस्त बन जाते हैं।

पर कुछ समय बाद तीनो युवकों को मंजरी से प्यार होता है और वे अपनी भावनाएं एक दूसरे के सामने रखते हैं। तीनो ये तय करते हैं के मंजरी के जन्म दिन पर वो किससे प्यार करती है ये ढूंढा जाए। पर उस रात जो घटना घटती है, उसके बाद चारों की दोस्ती में दरारें पड़ती हैं।

चार वर्ष बाद तीनो युवक फिर एक बार मिलते हैं। मंजरी इस समय अपने जीवन के कठिन पड़ाव से गुज़र रही है, जिसमें उसकी मदद करने तीनो आये हैं। सारे पुनः उसी मेडिकल कॉलेज के कैंपस में आते हैं जहाँ उन्होंने वो पिछली कड़वी याद पीछे छोड़ दी थी। आगे वो कैसे अपनी टूटी हुयी दोस्ती को जोड़ते हैं और कैसे अपने जीवन में आगे बढ़ते हैं यही फ़िल्म की कहानी है। 

उस घटना का बोझ उन में से हर किसी को कैसे बदल देता है और घटना अपने अंतिम चरम तक न पहुंचने से चारों में जो बदलाव हुये हैं, उसे समझदारीसे दर्शाया गया है।

पांडे, कमानी और मल्होत्रा के किरदार हमारे इर्दगिर्द ही पाए जाते हैं और तीनोने अपने किरदारों को सूझबूझ के साथ निभाया है। उनकी अच्छी अदाकारीसे स्क्रीनप्ले को भी आधार प्राप्त होता है।

सिमरन शर्मा में आत्मविश्वास झलकता है और बेहतर अभिनय के गुण भी नज़र आते हैं। भावुक क्षणों में और एक दृश्य में जहाँ मंजरी शराब के नशे में है, वे थोड़ा कमज़ोर पड़ती नज़र आती हैं।

दुर्भाग्य से विपिन पतवा, जॉर्ज जोसेफ और राज आशू का संगीत आपका ध्यान आकर्षित नहीं कर पाता।

स्क्रिप्ट में हमेशा इस्तेमाल किये गए प्लॉट्स भी नज़र आते हैं और कुछ कुछ जगहों पर अटपटासा स्क्रीनप्ले भी दिखता है, पर फिर भी फ़िल्म अपनी कहानी सही ढंगसे बताने में कामयाब हुयी है।

पहली बार निर्देशन कर रहे अभिषेक दीक्षित का लेखन एवं निर्देशन अच्छा है। उन्होंने राजश्री के फॉर्मूला को छेद देते हुये परिवार को ही ख़लनायक बना दिया है। उनके महत्वपूर्ण किरदारों में ही दुविधा है। वे सही या ग़लत नहीं हैं। उन में कुछ अच्छाइयां तो कुछ बुराइयां भी हैं। मात्र फ़िल्म की धीमी गती और काफ़ी बढ़ा हुआ दूसरा भाग कहानी को खींचते है।

आजके ज़माने में रूहानी प्यार, रोमैंटिक प्यार और फ्रेंड्स विथ बेनिफिट्स इनमे काफ़ी बारीक सिमा रेखा है। जहाँ आजकल दो घडी के प्यार का माहौल है जिसमे रिश्ता निभाने का कोई बंधन नहीं होता, ऐसे समय में ये कहानी बड़ी ही सीधी और सरल है।

चार दोस्तों के दोस्ती के ये सीधी सरल कहानी है, जहाँ वो अपने भूतकाल में हुयी घटना को फिर एक बार मिलकर सुलझाने की कोशिश करते हैं और इससे अपनी दोस्ती बरक़रार करते हैं।

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