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गली बॉय रिव्ह्यु – ज़ोया अख़्तर की इस आशावादी फ़िल्म में रणवीर सिंह एक नए आवाज़ के साथ गूंज रहे हैं

Release Date: 14 Feb 2019 / Rated: U/A / 02hr 36min

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Cinestaan Rating

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  • Direction:
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Shriram Iyengar

नए आवाज़ को जन्म देती अंडरडॉग की ये कहानी, जिसे कोई भी अपने आप से जोड़ सकेगा, तथा इसकी सम्मोहित करती सिनेमैटोग्राफी धारावी के रास्तों को परदे पर ज़िंदा करती हैं।

याद कीजिये जब आपने पहली बार लेड झेप्लीन का 'स्टेअरवे टू हेवन' सुना हो, या मोहम्मद रफ़ी का 'याहू!', या रॉक ऑन!! फ़िल्मसे सोलो गिटार, क्या अनुभव रहा आपका? उसे गुनगुनाने से आप नहीं चूकते। संगीत को लेकर कोई कितना भी रुक्ष क्यों ना हो, पर ज़ोया अख़्तर की गली बॉय के अंत तक वो 'अपना टाइम आएगा' गाता हुआ ज़रूर दिखेगा।

ज़ोया अख़्तर ने इस फ़िल्म को बेहतरीन तरीके से बुना है। उन्होंने संगीत के ऐसे शैली को चुना है जो मजबूरी से उभरकर आयी है। मुराद (रणवीर सिंह) धारावी के झुग्गी जाल में पला बढ़ा है। जब उसके पिता दूसरी शादी करते हैं तो उनकी झोपड़ी में जी पाना मुश्किल हो जाता है। मुराद कविता और नज़्मों को पास करता है या फिर गर्म मिजाज़ी गर्लफ्रेंड सफीना (आलिया भट्ट) से बातें करता है।

एक कॉलेज फेस्टिवल में वो एमसी शेर (सिद्धांत चतुर्वेदी) से मिलता है। वो मुराद की मुलाकात मुंबई के रैपर जगत से करवाता है। पर उसके हर कदम पर एक रूकावट आती ही है। उसके पिता के अनुसार अगर वो ग्रॅज्युएट बनकर नौकरी कर ले तो उनके लिए वो ही बहुत है। पर जब मुराद किसी अमीर परिवार का ड्रायवर बन के उन्हें कहीं ले जा रहा होता है, तब परिवार के पिता अपनी बेटी से कहता है, "यहाँ हर कोई ग्रॅज्युएट है। क्या तुम्हे इसके तरह बनना है?"

मुराद अपनी परिस्थिति से लड़ता रहता है। स्काय (कल्कि केकलां) की मदत से मुराद को एक मंच मिलता है और वो अपनी कला दुनिया के सामने पेश करने में कामयाब होता है।

एक तरह से देखा जाए तो गली बॉय ऐसी अंडरडॉग कहानी है जिसका अंदाज़ा लगा पाना मुश्किल नहीं। हम जानते हैं के मुराद अपने रैपिंग की कला को साबित कर पायेगा। हम ये भी जानते हैं की उसका परिवार उसकी कला को समझने लगेगा। फ़िल्म में लव स्टोरी में हमेशा रहनेवाली कई घिसी पीटी चीज़े हैं, हाथ देनेवाली और लाभ उठानेवाला इन दोनों के संबंध, एक क्रिमिनल दोस्त और हर कदम पर उसे आनेवाली मुश्किलें। अंत में, ये एक आशावादी फ़िल्म है। और आशा का होना ज़िंदगी का होना है।

ज़ोया अख़्तर का स्क्रीनप्ले थोड़ा लंबा जरूर है, लेकिन वो रोमांचक और गंभीर है। पर इसे सही मायनो में फ़िल्म के कलाकारों ने निखारा है। विजय राज गरीबी की असलियत को समझने वाले बाप के किरदार में कमाल करते हैं। ड्रग बेचनेवाले दोस्त की भूमिका में विजय वर्मा बेहतरीन काम करते हैं।

सिद्धांत चतुर्वेदी पूरी फ़िल्म में बेहतर सूझबूझ के साथ ज़बरदस्त काम करते हैं। एमसी शेर मुराद के लिए हमेशा एक आइना बनकर खड़ा होता है। उसका एटीट्यूड, एक मशहूर रेपर जो अपने सच्चाईयों से झूझ रहा है उसका चित्रन, कमाल का है। उनका चार्म और व्यक्तित्व आप भूल नहीं सकते।

मुराद की माँ आफ़रीन की भूमिका में अमृता सुभाष, पुराने ख़यालो की दादी की भूमिका में ज्योति सुभाष, तथा सफीना की माँ की भूमिका में शीबा चड्ढा सभीने अपने किरदार को ज़िंदा किया है। कल्कि केकलां भी छोटीसी भूमिका के बावजूद अपनी छाप छोड़ती हैं।

महत्वकांशी और गर्म मिजाज़ी सफीना की भूमिका में आलिया भट को देखकर मज़ा आता है। वे केवल एक पलक झपकने के दृश्य में भी कमाल कर सकती हैं और वे यहॉं कर दिखाती हैं। जिसका जहाँ सिर्फ़ मुराद हो, वो अंगार बनती है जब उसे शक होता है के वो उससे दूर तो नहीं जा रहा। आलिया का काम इतना बेहतरीन है के रणवीर सिंह के काम पर वे हावी हो जातीं अगर रणवीर खुद दमदार अदाकारी ना दिखाते।

एक बात की खुशी है के कहीं तो ब्रेक-अप को सुंदरता से दर्शाने को टाला गया है। वो दुःखद है, लाऊड है और यकायक होता है। ये भी सुखद है के उसके बाद कोई दुःखभरा गाना नहीं चलता। वैलेंटाइन डे के दिन इस फ़िल्म का प्रदर्शित होना ये फ़िल्म देखकर सही लगता है।

सभी किरदारों को एक साथ बांधते हैं रणवीर सिंह, जो अपने दबे और संयत अभिनय से मोहित कर देते हैं। फ़िल्म के यादगार क्षणों को ढूंढें तो शायद मुराद की आँखों में उबलने वाले गुस्से को वो संयमित करने की कोशिश कर रहा है, वो हो सकता है। वो शांत तरीकेसे बोलता है, हलकी आवाज़ में, जो शायद कोई एक डर है के कहीं वो फट न जाए। फ़िल्म ऐसे पलों से भरी पड़ी है जहाँ धीरे धीरे टेंशन बढ़ रहा है और वो रैप में परावर्तित होकर बाहर निकलता है।

और किस तरह से बाहर निकलता है? रणवीर जिस खूबी और नियंत्रण से रिदम और शब्दों की बौछार को पेश करते हैं वो प्रशंसनीय है। वे खुद रैप में करिअर बना सकें इतनी सहजता उनमे है। वे हर दृश्य में स्क्रीन पर छा गए हैं और अपने आत्मविश्वास से आपका ध्यान आकर्षित करने में कामयाब होते हैं।

पूरी फ़िल्म में रैप एक नदी के बहाव की तरह घूमता है। ज़ोया अख़्तर और रीमा कागती ने स्क्रीनप्ले में रैप को कहीं भी घूमने की आज़ादी रखी है। इस फिल्म में शहर का गुस्सा कविता के माध्यम से निकलता हुआ लगता है।

जय ओझा का कैमरा वर्क भी तारीफ का हकदार है। उनका कैमरा हमेशा उनके नायक के चेहरे पर होता है। कैमरा भी उतनी ही आक्रमकता से शहर के भीड़ में खुद को ढूंढ़ते नज़र आता है। वो उससे अलग तभी होता है जब मुराद का ख़ालीपन होता है और जब वो स्टेज पर एकाकीपन में होता है। फ़िल्म का शुरुवाती शॉट जहाँ मुराद और उसकी गैंग कार को तोड़ते हैं, जिसे स्टायलाइज़्ड तरीकेसे शूट किया गया है जो धीरे धीरे भीड़ में खो जाता है, यह दर्शकों को फ़िल्म से जोड़ने का सुन्दर प्रयास है।

स्पेस, अपने आप से जुड़ने का समय और जगह, इस कहानी का महत्वपूर्ण हिस्सा है। मुख्यधारा के संगीत विश्वने जो दरारे छोड़ी हैं, वहीं से ये रैपर्स उभरकर आये हैं क्योंकि उनकी कहानी बताने की कोई जगह दूसरों ने नहीं छोड़ी है। एक दृश्य जिसमें मुराद बड़े से बाथरूम में जाता है और पहला काम करता है उस बाथरूम का नाप लेना, के ये असल में है कितना बड़ा, इसका सुंदर उदाहरण है।

बस हो या ट्रेन या घर, कैमरा हर वक़्त आक्रमकता से जगह की कमी को महसूस कराता है। इससे जब उनके विद्रोही संगीत के साथ साथ जगह भी पर्दे पर खुल जाती है तो वह अनुभव और तीव्र होता है।

ज़ोया अख़्तर की फ़िल्में, फिर वो चाहे ज़िंदगी ना मिलेगी दोबारा (2011) हो या दिल धड़कने दो (2015), इन पर आरोप होता रहा है के ये अमीरों की समस्याओं पर आधारित हैं। गली बॉय में वे इन फ़िल्मों से अलग दूसरी दुनिया में झांकती हैं और आशा और उम्मीदों की नयी उड़ान भरती हैं। ये वो फ़िल्म है जो आमतौर पर इस्तेमाल हो रहे संगीत शैलियों से भी आज़ादी मांगती है एक ऐसे स्वर में जिसे नज़रअंदाज करना मुमकिन नहीं।

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