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गूपी गवैया बाघा बजैया रिव्ह्यु – दो मूर्खों की हीरो बनने की मनोरंजक कहानी

Release Date: 07 Sep 2013 / 01hr 19min

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Sonal Pandya

निर्देशिका शिल्पा रानडे ने सत्यजीत रे की १९६९ की फ़िल्म गूपी गायने बाघा बायने के किरदारों पर नए सिरेसे काम कर उन्हें अलग अंदाज़ में इस फ़िल्म में प्रस्तुत किया है।

एनिमेटेड फ़िल्म गूपी गवैया बाघा बजैया पर बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी थी, क्योंकि इस कहानी पर भारत के प्रतिभावान निर्देशक सत्यजीत रे फ़िल्म बना चुके हैं। १९६९ की सत्यजीत रे द्वारा निर्देशित फ़िल्म गूपी गायने बाघा बायने बुद्धिजीवी संगीतकार उपेन्द्रकिशोर राय चौधरी की कहानी पर आधारित थी।

पचास वर्ष बाद इस कहानी को निर्देशिका शिल्पा रानडे ने एनिमेटेड फ़िल्म वर्जन में दर्शकों के सामने लाया है। हालांकि इस फ़िल्म का प्रीमियर २०१३ में टोरंटो इंटरनैशनल फ़िल्म फेस्टिवल में हो चूका था।

रानडे ने इस कहानी पर नए सिरेसे काम कर गूपी, एक गायक, और बाघा, संगीतकार बनने की चाह रखनेवाला एक कलाकार, इनकी कहानी प्रस्तुत की है। दोनों को अपनी कला पर ज़रुरत से ज़्यादा विश्वास है। पर सच्चाई ये है के दोनों अपनी कलाओं में बिलकुल भी अच्छे नहीं हैं और दोनों को उनके राज्य क्रमशः अमलोकि और चिम्कोली से निष्कासित किया जाता है क्योंकि उनका संगीत कोई भी सहन नहीं कर पाता।

गूपी (राजीव राज की आवाज़) और बाघा (मनीष भवन की आवाज़) दोनों जंगल में मिलते हैं। दोनों को डर है के जंगल में शेर उनको खा लेगा। दोनों एक दूसरे से भीड़ जाते हैं और उसी में गाना गाने लगते हैं। भूतों के राजा का ध्यान उनके गाने के तरफ आकर्षित होता है और उसे दोनों का बेढंगा गाना पसंद आता है। वो उन्हें चार (पुरानी फ़िल्म में तीन) वरदान बक्षिस स्वरुप प्रदान करता है।

दुनिया में कहीं भी कभी भी पहुंचने की शक्ति, एक ताली में मनचाहा खाना प्रस्तुत होना तथा अपने संगीत से किसी का भी मन मोह लेने की क्षमता को प्राप्त करने के बाद मानो दुनिया गूपी और बाघा के कदमो में है। वो शुण्डि राज्य में अपना नसीब आज़माने के लिए जाते हैं।

शुण्डि के राजा लक्ष्मीपती इस समय संकट में हैं क्योंकि उनके जुड़वां भाई और हुंडी के राजा पद्मापती उन पर कभी भी हमला कर सकते हैं। गूपी और बाघा शुण्डि के राजा को वचन देते हैं के वे इस लड़ाई को टाल देंगे और उसके बदले में राजा अपनी राजकुमारी मणिमाला से शादी का वचन देते हैं।

अपनी शक्तियों के साथ दोनों शुण्डि और हुंडी राज्य में खुशियाँ लाने निकलते हैं। पर दोनों की नादानी और धांदली की वजह से उन्हें अपना लक्ष्य गांठने में काफ़ी समय लगता है।

गूपी गवैया और बाघा बजैया का २डी एनिमेशन पेपरबोट एनिमेशन स्टुडिओज़ ने बेहद खूबसूरतीसे किया है। फ़िल्म का रंग अविष्कार लुभावना है। गूपी और बाघा जैसे एक राज्य से दूसरे राज्य में घूमते रहते हैं तो साथ साथ सुबह के लिए पीला रंग, मध्यरात्री के लिए नीला रंग और रात में बैंगनी रंग इस तरह स्क्रीन लुभावनी होती रहती है।

फ़िल्म के किरदार, उनके लम्बे चेहरे और उनके हावभाव, यूँ लगता है जैसे कहानी किताब से सीधे यहीं आई हो। भूतों के क्रूर राजा का लुक खास प्रभावित करनेवाला था।

शिल्पा रानडे खुद किताबों के लिए इलूस्ट्रेटर के रूप में काम करती हैं। फ़िल्म के पार्श्वभाग में हमें जो भी नज़र आता है वो किसी तलम कपडे की भाँति लगता है, जो भारतीय एनिमेशन फ़िल्मों में अभावसे ही नज़र आता है।

ओरिजिनल फ़िल्म के भांति यहाँ भी रोहित गेहलौट के संवाद में यमक नज़र आता है और होशियारी से शब्दों के खेल को रचा गया है। 3 ब्रदर्स एंड अ वायलिन ग्रुपने उत्साहवर्धक संगीत दिया है।

सौमित्र रानडे ने स्क्रीनप्ले के द्वारा कहानी में कुछ बदलाव किये हैं जो शायद मूल कहानी जानने वालों को अजीब लगे पर उससे कहानी बताने में कोई मुश्किल नहीं आती। गूपी गायने बाघा बायने के इस एनिमेटेड वर्जन ने अपना अलग अस्तित्व निर्माण किया है। अपने किरदार और उनकी दुनिया में उन्होंने जो प्रयोग किये हैं उससे ये फ़िल्म अपना एक अलग अस्तित्व बना लेता है।

भारत की बड़ों के लिए बनाई गयी पहली बच्चों की फ़िल्म के तौर पर इस फ़िल्म की प्रसिद्धि की जा रही है। इससे ये पता चलता है के भारत में एनिमेशन फ़िल्म्स को किस तरह से देखा जाता है। इस प्रॉडक्शन में भले ही देर लगी हो पर ये अनुभव देखने लायक है क्योंकि भारत की दूसरी एनिमेटेड फ़िल्म्स से ये फ़िल्म बिलकुल अलग है। इस फ़िल्म को सभी वर्ग के दर्शकों के लिए बनाया गया है।

गूपी और बाघा के युद्ध के विरोध में दिए गए संदेश तथा दोनों राज्यों में शांती बनाये रखने की उनकी जद्दोजहद, मंत्रियों की चालबाज़ी, जादुई दुनिया का खेल यह सब भारत की आज की परिस्थिति से कहीं ना कहीं मेल खाता है। भारत भी इस समय ऐसी स्थिति में है जहाँ युद्ध की आशंका बताई जा रही है।

हालांकि १९६९ की सत्यजीत रे की फ़िल्म ने अभी भी कईयों के ज़हन में जगह बनाये रखी है, शिल्पा रानडे की फ़िल्म भी अवश्य देखने योग्य है। ये एक बेहतरीन अनुभव है जिसे खोना नहीं चाहिए।

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