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छिछोरे रिव्ह्यु – नितेश तिवारी की मनोरंजक पेशकश

Release Date: 06 Sep 2019 / Rated: U/A / 02hr 26min

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Keyur Seta

सुशांत सिंह राजपूत और श्रद्धा कपूर अभिनीत यह फ़िल्म मनोरंजन के साथ एक अच्छा संदेश भी देती है।

नितेश तिवारी द्वारा निर्देशित छिछोरे का ट्रेलर देख कर कॉलेज कैम्पस पर आधारित कुछ पुरानी हिंदी फ़िल्मों की यादे ताज़ा हुई थी। मन्सूर ख़ाँ की जो जीता वही सिकंदर (१९९२) फ़िल्म में दिखाई गयी कॉलेज की मस्ती, 'विनर्स' और 'लूजर्स' के बीच का स्पोर्ट्स ड्रामा, इन वजहों से ये फ़िल्म सबसे अधिक याद आती है।

छिछोरे में आमिर ख़ाँ की फ़िल्म के कुछ तत्व ज़रूर नज़र आते हैं पर फ़िल्म की कहानी साधारणतः करण जोहर की स्टुडंट ऑफ़ द ईयर (२०१२) से समानता रखती है।

छिछोरे की कहानी १९९२ से शुरू होती है, जब अनिरुद्ध उर्फ़ अन्नी (सुशांत सिंह राजपूत) मुम्बई के सबसे प्रतिष्ठित इंजीनियरिंग कॉलेज में दाखिला लेता है। वहाँ हॉस्टल में वो सेक्सा (वरुण शर्मा), एसिड (नविन पॉलीशेट्टी), बेवड़ा (सहर्ष कुमार शुक्ल) और डेरेक (ताहिर राज भसीन) जैसे सीनियर्स से मिलता है।

सीनियर्स के कुछ असहज अनुभवों के बाद अन्नी और एक ज्युनियर मम्मी (तुषार पांडे) की सीनियर्स के साथ गहरी दोस्ती हो जाती है। साथ ही अन्नी को उसकी सहपाठी माया (श्रद्धा कपूर) से प्यार हो जाता है।

कॉलेज का एक और ग्रुप है जो इस हॉस्टल में रहनेवाले लड़कों को लूजर्स बुलाता है। रैगी (प्रतीक बब्बर) और उसके दोस्तों का ये ग्रुप ऊँचे हॉस्टल में रहता है। अन्नी और उसके दोस्त अगर रैगी और उसके ग्रुप को कॉलेज के सालाना प्रतियोगिता में हरा दें तो उन पर से लूजर्स टैग हट सकता है।

कहानी अब २०१९ में आती है। आज के आधुनिक समय में संपर्क के इतने संसाधन होने के बावजूद एक समय एक दूसरे के इतने करीब आ चुके दोस्त अब एक दूसरे के संपर्क में नहीं हैं। पर एक दोस्त की तबियत अचानक चिंताजनक होने की वजह से सब दोस्त अस्पताल में इतने साल बाद फिर एक बार मिलते हैं।

स्टुडंट ऑफ़ द ईयर से इस कहानी की समानताएं आप भुला सकते हैं क्योंकि नितेश तिवारी, पियूष गुप्ता और निखिल मेहरोत्रा ने इसे इतनी खूबसूरती से लिखा है के २०१२ की फ़िल्म की खांमियों को ठीक करते हुई वे ये दिखाते हैं के ऐसी कहानी को किस प्रकार से पेश करना चाहिए। दो समानांतर कहानियों को एक घटना के साथ जोड़ कर इसे बेहतरीन रूप से पेश किया गया है। ये कहना भी शायद अतिशयोक्ति नहीं होगी के छिछोरे का स्क्रीनप्ले फ़िल्म स्कूल्स में पढ़ाने लायक है।

तिवारी ने अपनी पिछली फ़िल्म दंगल (२०१६) से खुद का एक ऊंचा स्तर बनाया है। खास कर कुश्ती के दृश्यों में उनकी महारत नज़र आती है। वही महारत यहाँ भी दिखाई देती है। पर यहाँ तीन-चार खेलों पर उन्होंने ध्यान केंद्रित किया है। ऐसे कुछ क्षण हैं जहाँ आप चाहते हैं के कुछ हो और आप जानते हैं के वही होगा, पर फिर भी तिवारी आपको चकित करते हैं। ये क्षण फ़िल्म का खास क्षण बन जाते हैं।

तिवारी ने सभी कलाकारों से बेहतरीन काम करवाया है, फिर वो चाहे आज के समय के दृश्य हों या कॉलेज के समय के। सुशांत सिंह राजपूत कॉलेज स्टुडंट लगते तो नहीं, पर उनकी अभिनय क्षमता से उसे वे नज़रअंदाज़ करने पर मजबूर करते हैं। श्रद्धा कपूर ने भी अपना बेहतरीन प्रदर्शन दिया हैं।

पर वरुण शर्मा ने सेक्सा के रूप में खुल कर और कमाल काम किया है। फुक्रे फ़िल्म का उनका मशहूर किरदार चूचा भी यहाँ याद आता है, पर वो सिर्फ़ कुछ जगहों पर। बड़ी उम्र में उन्होंने अपनी उत्तम अभिनय क्षमता को सिद्ध किया हैं।

भसीन, पॉलीशेट्टी, पांडे, शुक्ल और बाकी कलाकारों ने भी यादगार काम किया है। सबसे अच्छी बात ये है के इन दोस्तों की यारी १९९२ और २०१९ में भी सच्ची ही लगती है।

पर कॉलेज की कहानी इस फ़िल्म का मात्र एक हिस्सा है। कहानी का एक अहम भाग उस युवक की कहानी है, जिसके माता-पिता के बीच बनती नहीं और जो अपने को असफल समझता है। इन चीज़ो को जिस खूबी से दर्शाया गया है, वही छिछोरे की असली जीत है।

कुछ पुरानी फ़िल्मो से समानताओं के अलावा, फ़िल्म में एक खामी भी नज़र आती है, जब एक ग्रुप आईसीयू में गंभीर पेशंट को कहानी सुना रहा है और डॉक्टर्स को इन चीज़ों से कोई परेशानी नहीं होती। कुछ और भी छोटी मोटी खामियां हैं, पर फ़िल्म जिस तरह से मनोरंजक रूप से आगे बढ़ती रहती है, आप इन खामियों को माफ़ कर सकते हैं। आप थिएटर से बहुत सारी यादें ताज़ा करके निकलते हैं और एक महत्वपूर्ण संदेश भी आपको मिलता है। जीत के बाद उसे कैसे मनाया जाया ये तो हम पहले ही तय कर लेते हैं, पर हार के बाद उसका कैसे सामना किया जाए इस बारे में हम तैयार नहीं रहते। इन्हीं बातों से ये एक यादगार अनुभव बन जाता है।

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