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राय: हर बार अपनी भूमिका बनाने के लिए सिनेमाघरों का इस्तेमाल न करें


अधिक संक्रमणशील जगहों को खुला रख कर तुलनात्मक दृष्टी से अधिक सुरक्षित जगहों को बंद करके कोई लाभ नहीं होनेवाला।

Editorial Board

दिल्ली सरकार द्वारा कोविड-१९ के बढ़ते संक्रमण पर तुरंत सुरक्षात्मक कदम उठाने के लिए दोष नहीं दिया जा सकता। खास कर तब जब दिल्ली और पास के राज्यों में पिछले वर्ष कोरोना की दूसरी लहर ने काफी कहर बरसाया था। पर इन सुरक्षात्मक कदमों में हर बार सबसे पहले सिनेमाघरों को बंद करना ये एक रिवाज बनते जा रहा है, जिस पर पुनर्विचार जरूरी है।

सिनेमाघरों में, खास कर मल्टीप्लेक्स में, जितने भी दर्शक आए, उन सभी ने ये अनुभव किया के इन जगहों की बहुत ही सुरक्षित ढंग से निगरानी रखी गयी है और महामारी के समय सिनेमाघर सुरक्षित जगहों में से एक बने हैं। अगर सबसे असुरक्षित जगह कोई होगी तो वो हैं आम सड़क जहाँ काम पर निकले लोग और दुकानदारों द्वारा सुरक्षा नियमों का सरे आम उल्लंघन हो रहा है। इन अति प्रभावशील जगहों को खुला रख कर सुरक्षित जगहों को बंद करना बहुत अजीब है।

महामारी ये अभी की वास्तविकता है और उसके प्रभाव को कम करने के लिए हर संभव प्रयास किए जाने चाहिए, पर किसी पुरानी प्रणाली को प्रभाव जाने बगैर इस्तेमाल में लाते रहने से कोई लाभ नहीं होगा। जब २०२० में पहली बार महामारी आयी थी, तब इस तरह की उपाय योजना करना समझा जा सकता था। तब किसी को इसके बारे में कोई सही जानकारी नहीं थी, के कैसे इस महामारी को रोका जाए या इससे बचा जाए। पर दो वर्ष बाद भी इन उपाय योजनाओं में कोई भी सुधार किए बगैर इनका इस्तेमाल करने का कोई तुक नहीं बनता।

महामारी के साथ लड़ने की पूरी तैयारी करने के बाद अगर एक्झिबीटर्स को ये लग रहा है के सिनेमाघरों पर ये ज़्यादती हो रही है, तो उनकी सोच को गलत नहीं कहा जा सकता। अगर कोई व्यवसाय ज़्यादा संगठित और सुनियोजित रूप से काम कर रहा है, तो ये उसे हर बार लक्ष्य बनाने का कारण नहीं हो सकता।

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