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सेंसरशिप पर अदूर गोपालकृष्णन की तीखी प्रतिक्रिया, फ़िल्मों के लिए अलग मंत्रालय की मांग


एक समाचारपत्र में छपे लेख में ७९ वर्षीय पद्म भूषण सम्मानित अदूर गोपालकृष्णन ने फ़िल्मों के प्रदर्शन में कैंसर से ग्रस्त इंसान के बिगड़े चेहरे को दिखाने के निर्णय की निंदा की।

Our Correspondent

सेंसर बोर्ड याने के सेन्ट्रल बोर्ड ऑफ़ फ़िल्म सर्टिफिकेशन के शुरू होने से ही इसके काम करने के तरीके पर हमेशा बहस होती रही है। कई फ़िल्मकार और फ़िल्मों के चाहनेवालों को ये लगता है के सेंसरशिप ये एक पुरानी संकल्पना है जिसका लोकतंत्र में कोई स्थान नहीं है, पर कुछ लोग ऐसे भी हैं जो इस संकल्पना के पक्ष में हैं।

भारत के सन्माननीय फ़िल्मकारों में से एक हैं अदूर गोपालकृष्णन, जिन्हें कई राष्ट्रिय पुरस्कारोंसे सम्मानित किया गया है, उन्होंने हाल ही में इंडियन एक्सप्रेस समाचारपत्र में प्रकाशित तीखे लेख द्वारा सेंसरशिप की कड़ी आलोचना करते हुए लिखा के स्क्रीनिंग्स के दौरान जो सूचनाएं दिखाई जाती हैं, वे दर्शकों के अनुभव को ख़राब करती हैं और निर्माताओं पर बोझ बढाती हैं।

७९ वर्षीय अदूर ने अपने लेख में याद दिलाया के एस के पाटिल समिति द्वारा प्रस्तुत ऐतिहासिक प्रोपोजल में फ़िल्म इंस्टीट्यूट, एक वार्षिक आंतरराष्ट्रीय फ़िल्म महोत्सव, एक फ़िल्म फायनान्स कॉर्पोरेशन, एक राष्ट्रिय फ़िल्म आर्काइव और राष्ट्रिय फ़िल्म पुरस्कार की बात की गई थी।

उन्होंने यह भी याद दिलाया के शिवराम कारनाथ, मृणाल सेन और श्याम बेनेगल की अध्यक्षता में बने फ़िल्म स्टडी ग्रुप के सदस्यों ने सरकार को सेंसरशिप हटाने की सूचना की थी। उनके अनुसार ये एक पुरानी और इस समय से असंगत ऐसी संकल्पना है। पर इस सूचना पर कोई कदम नहीं उठाया गया क्योंकि इस ग्रुप के दो सदस्य, बी आर चोपड़ा और रामानंद सागर, ने इस प्रोपोजल का विरोध किया था।

अदूर के अनुसार तब से सभी सरकारों ने सेंसर प्रमाणपत्र का इस्तेमाल कर फ़िल्मकार की कलात्मक अभिव्यक्ति में दखलअंदाज़ी करना शुरू किया है।

फ़िल्म के स्क्रीनिंग्स के दौरान कैंसर ग्रसित इंसान के बिगड़े चेहरे को दर्शाने की सख्ती की उन्होंने कड़ी निंदा की। "इससे अधिकारियों की असंवेदनशीलता ही सामने आती है। कैंसर एक भयानक बीमारी है और उसके भयंकर दृश्य दिखा कर क्या हमें इसे और डरावना बनाना चाहिए? अगर देखा जाए तो कोई भी समझदार सेंसर इसे सार्वजनिक रूप से दिखाने पर पाबंदी ले आएगा," उन्होंने लिखा।

उन्होंने इस बात को भी सामने रखा के स्वतंत्र फ़िल्मकारों को आवश्यक प्रमाणपत्र पाने के लिए कितनी मुश्किलों से गुजरना पड़ता है। उन्होंने लिखा, "जानवरों के साथ किसी भी तरह की हिंसा का प्रयोग नहीं हुआ है, इस बात की पुष्टि के लिए उन्हें भारतीय पशु कल्याण बोर्ड से एक प्रमाणपत्र लेना होता है के फ़िल्म के शूटिंग के दौरान किसी भी जानवर को आहत नहीं किया गया है। संबंधित अधिकारी दूर कहीं फरीदाबाद में बैठे होते हैं और बेचारा निर्माता अपने स्थान से इतनी दूर तक पहुंच नहीं पाता। तो इस समस्या का निवारण मध्यस्थ व्यक्ति द्वारा मोटी रकम देकर किया जाता है।"

स्वतंत्र निर्माताओं के साथ कैसा व्यवहार होता है और बड़े निर्माताओं को कैसे किसी भी चीज़ के लिए सुविधाएं मिल जाती हैं, इस बात पर भी उन्होंने अपनी नाराज़गी जताई। इसका उदाहरण देते हुए उन्होंने एक मलयालम फ़िल्म का ज़िक्र किया जिसकी कहानी चीते की हत्या के इर्द गिर्द घूमती है। शायद उनका निर्देश २०१६ में आयी मोहनलाल अभिनीत पुलिमुरुगन की ओर था। उन्होंने दावा किया के फ़िल्म को किसी भी कट और सूचनाओं के बजाय प्रमाणित किया गया।

उन्होंने आगे बताया के प्रमाणपत्र हासिल करने की लम्बी, हास्यास्पद और महंगी प्रक्रिया के कारण ज़्यादातर फ़िल्मों में केवल इंसानी दुनिया नज़र आती है और प्रकृति के अन्य जीवों को दुर्लक्षित किया जाता है।

अदूर के अनुसार इसका एक कारण यह भी है के जो फ़िल्म को एक कलात्मक अभिव्यक्ति मानते हैं, ऐसे लोग कम हैं और जब योजनाए बनती हैं तो उनके मतों पर विचार नहीं होता।

उन्होंने लेख की समाप्ति की ओर फ़िल्मों के लिए स्वतंत्र मंत्रालय का सुझाव दिया, जो के ऐसे देशों में मौजूद है जहाँ फ़िल्म संस्कृति को बढ़ावा दिया जाता है। पद्म भूषण प्राप्त अदूर गोपालकृष्णन ने बीस के करीब प्रसिद्ध फ़िल्में बनाई हैं।

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