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सारांश के ३५ वर्ष – पढ़िए अनुपम खेर अभिनीत महेश भट्ट की फ़िल्म के ७ मज़ेदार तथ्य


२५ मई १९८४ को प्रदर्शित सारांश में अनुपम खेर और रोहिणी हट्टंगडी ने बुजुर्गों की भूमिका निभाई थी। दोनो उस समय ३० वर्ष के उम्र के आसपास थे।

Keyur Seta

१९८० के दशक के शुरुवात में समानांतर सिनेमा भारत में अपने चरम पर था। श्याम बेनेगल और गोविन्द निहलानी जैसे निर्देशक एक के बाद एक फ़िल्मों से दर्शकों को अलग अनुभूति दे रहे थे।

महेश भट्ट की सारांश (१९८४) इन्ही फ़िल्मों में से एक थी। आज के दर्शक शायद इस बात से अचंबित हों, क्योंकि उन्होंने महेश भट्ट के बैनर तले इमरान हाश्मी की फ़िल्मों को ही बनते देखा है।

सारांश एक वृद्ध जोड़े की कहानी थी। बी वी प्रधान (अनुपम खेर) और उनकी पत्नी पार्वती (रोहिणी हट्टंगडी) का एकलौता जवान बेटा अमरीका में एक दुर्घटना में मारा जाता है। वैसी दुर्घटना जैसे आज आम बात सी हो गई है, के अमरीका में किसीने अंधाधुन गोलियॉं चलाई और कईयों को मार डाला।

अपने बेटे की मृत्यु को प्रधान और उनकी पत्नी अभी तक भुला भी नहीं पाए हैं के एक स्ट्रगलिंग अभिनेत्री सुजाता (सोनी राज़दान) उनके यहाँ पेईंग गेस्ट के रूप में रहने आती है।

सुजाता अपने बॉयफ्रेंड विलास (मदन जैन) सें संबंध रखती है। एक दिन उसे पता चलता है के वो गर्भवती है। पार्वती, जो अभी तक अपने बेटे के जाने का ग़म भुला नहीं सकी, सोचती है के सुजाता के पेट में जो बच्चा है वो उसके बेटे का पुनर्जन्म है। प्रधान, जो नास्तिक है, इस बात को नहीं मानता।

पर इस जोड़े को और भी मुश्किल दौर से गुजरना है। विलास का बाप, गजानन चित्रे, एक नेता है। वो चाहता है के इस बच्चे को कैसे भी कर के गिराया जाए, क्योंकि चुनाव का समय आ रहा है और वो अपने कैम्पेन में कोई कांड नहीं चाहता।

आज के दिन सारांश को प्रदर्शित हुए ३५ वर्ष पूरे होते हैं। इस मौके पर आइये आपको इस फ़िल्म के ७ मज़ेदार तथ्यों से रूबरू करा दें।

१. अनुपम खेर ने इस फ़िल्म से हिंदी फ़िल्म जगत में प्रवेश किया था। खेर उस समय सिर्फ़ २८ वर्ष के थे, फिर भी उन्होंने ६० वर्ष से अधिक उम्र के मुख्य किरदार को निभाया। इस भूमिका को उन्होंने इस कदर निभाया के कई लोग ये मानने को ही तैयार नहीं थे के खेर असल में बूढ़े नहीं हैं। इस भूमिका के लिए १९८५ के फ़िल्मफ़ेअर सर्वोत्तम अभिनेता के पुरस्कार से खेर को नवाज़ा गया था।

पर आज ये बात बहुत कम लोग जानते हैं के फ़िल्म निर्माता खेर के बारे में उलझन में थे और उन्हें साइन करने के बाद भी वे उन्हें बदलने के बारे में विचार कर रहे थे। पर सौभाग्य से ऐसा कुछ नहीं हुआ और जो हुआ वो इतिहास बन गया।

एक और मज़े की बात ये थी के रोहिणी हट्टंगडी भी ३० वर्ष से थोड़ी अधिक के उम्र की थीं और उन्होंने भी अपने से कई अधिक उम्र की पार्वती का किरदार निभाया। पर इससे पूर्व उन्होंने रिचर्ड एटनबरो की ऑस्कर अवार्ड प्राप्त फ़िल्म गाँधी (१९८२) में युवा और वृद्ध कस्तूरबा की भूमिका निभाई थी। इसलिए उनके बारे में दर्शकों को कोई अचंबा नहीं हुआ।

हट्टंगडी भी १९८५ के फ़िल्मफ़ेअर सर्वोत्तम अभिनेत्री अवार्ड के लिए नामांकित थीं, पर ये पुरस्कार भावना (१९८४) फ़िल्म के लिए शबाना आज़मी को दिया गया।

२. ये कहानी है एक वृद्ध जोड़े की जिनके बेटे की न्यू यॉर्क में एक खुनी हमले में हत्या की जाती है। अपने आध्यात्मिक गुरु यू जी कृष्णमूर्ति के बेटे की मौत से प्रेरित होकर भट्ट ने ये कहानी लिखी थी।

उन्होंने एक और घटना से इस फ़िल्म की प्रेरणा ली जहाँ एक महाराष्ट्रियन जोड़े के बेटे की न्यू यॉर्क में हत्या कर दी गई थी। भट्ट ने खुद देखा था के उस माँ ने एक गुरु से पूछा था के क्या उसका बेटा पुनर्जन्म लेगा।

३. सारांश एकलौती ऐसी हिंदी फ़िल्म है जो ज़्यादातर मध्य मुम्बई के शिवाजी पार्क में शूट की गई है। इस फ़िल्म से पूर्व बासु चैटर्जी की छोटीसी बात (१९७५) के कुछ दृश्य इस भाग में शूट किये गए थे। अमोल पालेकर, अशोक कुमार और विद्या सिन्हा ने इस फ़िल्म में मुख्य भूमिकाएं निभाईं थीं।

डाइरेक्टर्स डायरीज़ इस किताब में महेश भट्ट ने लेखक राकेश आनंद बक्शी को बताया के उनका बचपन शिवाजी पार्क में गुजरा था और वे उस बिल्डिंग को दिखाना चाहते थे जिसमे वे रह चुके थे।

४. इस फ़िल्म में दिग्गज अभिनेता नीलू फुले ने गजानन चित्रे के किरदार को निभाया था। चित्रे एक राजनीतिक पार्टी का मुख्य है और हमेशा भगवा वस्त्र पहने दिखता है। ऐसी भी चर्चा थी के यह किरदार शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे पर आधारित था। साथ ही चित्रे ये उपनाम ठाकरे के करीब महसूस होता है। पर इस पर कोई भी अधिकृत बात नहीं की गई।

५. १९९० के दशक के सफल निर्देशक सूरज बड़जात्या और डेविड धवन सारांश की टीम के हिस्सा थे। बड़जात्या महेश भट्ट के असिस्टंट थे और धवन इस फ़िल्म के एडिटर थे। सारांश का निर्माण ताराचंद बड़जात्या के बैनर राजश्री फ़िल्म्स के तले किया गया था।

निर्देशक बनने के बाद सूरज बड़जात्या और धवन ने अलग अलग शैली की फ़िल्मों को अपनी खासियत बना ली। बड़जात्या पारिवारिक मनोरंजन के लिए जाने जाते हैं तो धवन कमर्शियल कॉमेडी फ़िल्मों के निर्देशक के रूप में प्रसिद्ध हैं।

६. सारांश में हिंदू धर्म में मानी जानेवाली पुनर्जन्म की कल्पना को नकारा गया है। पर ताराचंद बड़जात्या इस बात के लिए पहले राज़ी नहीं थे। भट्ट ने इस बात को राकेश आनंद बक्शी की किताब में स्पष्ट किया है। उन्होंने कहा, "मैंने उनसे [बड़जात्या से] कहा के राज़दान के पेट में जो बच्चा है वो खेर के बेटे का पुनर्जन्म है ये दिखाने के लिए मैं अपने स्क्रिप्ट में बदलाव नहीं करूँगा। ताराचंदजी मुझ पर बहुत गुस्सा हुए थे। 'तुम भारत के संत-महात्माओं से ज़्यादा जानते हो?' उन्होंने कहा। और भट्ट ने कहा, 'नहीं। पर ये मेरा मानना है और मैं उसी पर दृढ रहूँगा।"

७. महेश भट्ट ने अनुपम खेर को हिंदी फ़िल्मों में पहला काम दिया और वो भी मुख्य नायक का। इसलिए अनुपम खेर उन्हें अपना गुरु मानते हैं। भारतीय गुरु-शिष्य परंपरा को ध्यान में रखते हुए खेर जब भी कोई फ़िल्म साइन करते हैं तो उसमे से एक टोकन निधि गुरु दक्षिणा के रूप में महेश भट्ट को देते हैं।

कई वर्ष पहले खेर ने टीव्ही पर ये बात कही थी। द अनुपम खेर शो में महेश भट्ट के साथ उनके संबंधों के बारे में उन्होंने कहा था के कभी कभी जब भट्ट काफ़ी पिए हुए थे तो उन्होंने देर रात उन्हें उनके घर भी पहुँचाया है।

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