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क्या पी एम नरेंद्र मोदी फ़िल्म चुनाव आयोग के आचार संहिता के विरोध में जाएगी?

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ओमंग कुमार निर्देशित तथा विवेक आनंद ओबेरॉय अभिनीत फ़िल्म पी एम नरेंद्र मोदी अब ५ अप्रैल को प्रदर्शित हो रही है। गौरतलब है के फ़िल्म का प्रदर्शन लोकसभा चुनाव के पहले सत्र के कुछ दिन पहले हो रहा है।

Keyur Seta

Shriram Iyengar

भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जीवन पर बन रही बायोपिक फ़िल्म अब ५ अप्रैल को प्रदर्शित हो रही है। ओमंग कुमार निर्देशित इस फ़िल्म का शीर्षक है पी एम नरेंद्र मोदी और इसमें अभिनेता विवेक आनंद ओबेरॉय मोदी की भूमिका निभा रहे हैं।

यह फ़िल्म पहले १२ अप्रैल को प्रदर्शित हो रही थी जो के आम चुनाव के सात सत्रों में से पहले सत्र के समाप्ति का दूसरा दिन है। पर मंगलवार को फ़िल्म निर्माताओं ने घोषित किया के फ़िल्म प्रदर्शन की तारीख पूर्व निर्धारित तारीख से एक सप्ताह पहले, याने के ५ अप्रैल, की गई है।

भारत में बायोपिक फ़िल्म्स आम तौर पर किसी व्यक्ति विशेष के गुणगान में ही बनाई जाती हैं। प्रधानमंत्री के जीवन पर बन रही इस बायोपिक से भी किसी को कोई और उम्मीद नहीं होगी, खास तौर पर जब इस फ़िल्म को भाजपा का आशीर्वाद मिला है तथा चुनाव प्रचार के समय इसका प्रदर्शन हो रहा है।

चुनाव आयोग ने इस महीने के शुरुवात में चुनाव की तारीख घोषित करने के साथ ही चुनावी आचार संहिता लागू हो गयी थी।

मॉडेल कोड ऑफ़ कंडक्ट या आचार संहिता के माध्यम से सभी उम्मीदवारों की प्रचार की सीमाओं को बांधा जाता है तथा सरकार को सत्ता पक्ष के लिए प्रचार करनेसे रोका जाता है। आचार संहिता के दौरान किसी भी नयी योजना या नये प्रोजेक्ट्स की घोषणा या उनका उद्घाटन नहीं किया जा सकता। साथ ही, चुनाव शुरू होने से ४८ घंटे पूर्व एक सायलेंस पीरियड लागू होता है, जब किसी भी पक्ष को रास्तेपर, प्रिंट मिडिया या एयरवेव्ज़ के माध्यम से प्रचार की अनुमति नहीं दी जाती।

इन्ही मुद्दों पर नज़र डालें तो इस बायोपिक तथा मोदी पर बन रही वेब-सीरीज़ को विरोध हो सकता है, क्यूंकि विरोधकों को यह सायलेंस पीरियड के दौरान किया गया प्रातिनिधिक स्वरुप का प्रचार लग सकता है।

विवेक ओबेरॉय मोदी के नौ विविध रूप में

कुछ वर्षों से चुनाव आयोग द्वारा सभी पक्षों की आम सहमति से आचार संहिता को और बेहतर बनाया जा रहा है। हालांकि कानून में इसका कोई आधार नहीं है, मगर फिर भी चुनाव के दौरान उम्मीदवारों की नैतिकता के कुछ मापदंड इस आचार संहिता द्वारा तय किये गए हैं। साथ ही चुनाव आयोग को हक़ है के अगर कोई आचार संहिता का उल्लंघन करता है तो उनकी उम्मीदवारी को रद्द करे।

फिर भी, पिछले कुछ वर्षों से राजकीय पक्षों ने आचार संहिता की कमियों का फायदा उठा कर चुनाव के दौरान पक्ष का चेहरा सदा चर्चा में रखा है। इसका प्रसिद्ध उदाहरण अगर दिया जाए तो पिछले लोकसभा चुनाव के दौरान तब के प्रधानमंत्री पद के दावेदार नरेंद्र मोदी ने न्यूज़ फोटोग्राफर्स तथा कैमरामैन के सामने कमल के साथ पोज़ दी थी। कमल भाजपा का चुनाव चिन्ह है।

इन मुद्दों को ध्यान में रख कर, प्रधानमंत्री पद के दावेदार के जीवन पर आधारित एक फ़िल्म का प्रदर्शन चुनाव के दौरान हो, क्या ये आचार संहिता का उल्लंघन कहलायेगा? पूर्व आम आदमी पक्ष के नेता तथा स्वराज अभियान पक्ष के प्रमुख योगेंद्र यादव ने कहा, "ये गलत है, लेकिन इस सरकार से आप और क्या उम्मीद कर सकते हैं?"

सामाजिक तथा राजकीय विशेषज्ञ सुहास पलशीकर का कहना है, "ये आचार संहिता का उल्लंघन है। चुनाव आयोग ने इसके खिलाफ कार्यवाही करनी चाहिए।"

फ़िल्मों का सामाजिक तौर पर बढ़ता प्रभाव देख कर फ़िल्मों में राजकीय प्रोपगंडा किया जाने लगा। लेनिन ने कहा था, "सभी कलाओं में सिनेमा हमारे लिए सबसे महत्वपूर्ण है।" २०वे शतक के प्रारंभिक दौर में सेर्गेय आइजन्स्टाइन तथा जिगा वर्तोव की फ़िल्मों को नए नए उभर रहे सोवियत यूनियन में कम्युनिस्ट शासन के प्रभाव को बढ़ाने के लिए इस्तेमाल किया गया।

हिटलर के कार्यकाल में कुख्यात प्रोपगंडा मंत्री जोसेफ गेबेल्स ने जर्मन फ़िल्मों को नाज़ी विचारप्रणाली को दृढ़ बनाने के लिए इस्तेमाल किया था। लेनी रीफेन्स्टाल के १९३६ के बर्लिन ऑलिम्पिक्स के चित्रण से इस बात की पुष्टि होती है।

भारत में, हाल ही में प्रदर्शित हुई उरी – द सर्जिकल स्ट्राइक (२०१९) इसका उदाहरण हो सकती है। रु२८ करोड़ लागत से बनाई गयी इस फ़िल्म ने अपने नौवे सप्ताह तक रु२३० करोड़ से अधिक कमाई की है। १४ फरवरी को हुए पुलवामा हमले और उसके बाद भारत द्वारा किये गए हवाई हमले से फ़िल्म की कमाई में और इज़ाफ़ा होता गया।

अमित शाह बने मनोज जोशी

ऐसे हालात में विद्यमान प्रधानमंत्री की बायोपिक को चुनाव के दौरान प्रदर्शित किया जाए और वो भी अगर व्यावसायिक फ़िल्मों की भांति बनाई गई हो तो मतदाताओं को प्रभावित करेगी इसकी आशंका अधिक है।

इसका एक और पुराना उदाहरण है। तमिलनाडु की पूर्व मुख्यमंत्री दिवंगत जे जयललिता तथा उनके गुरु और पूर्व मुख्यमंत्री रहे एम जी रामचंद्रन की हिट फ़िल्मों को आचारसंहिता के दौरान फिर से प्रदर्शित किया जाता था।

आचार संहिता के दौरान फ़िल्म और वेब-सीरीज़ के प्रदर्शन को विरोध करने के लिए कई नियमों का आधार लिया जा सकता है। इनमे से एक नियम के अनुसार आचार संहिता के दौरान राजकीय पक्षों को किसी भी व्यक्ति के निजी जीवन पर किसी प्रकार के वक्तव्य या कार्यक्रम द्वारा आघात पहुंचाने से रोका जाता है तथा ऐसे वक्तव्य करने से भी रोका जाता है जो असभ्य या अनैतिक हो।

चुनाव आयोग ने वेब-साईट पर दिए गए दिशादर्शक लाइन्स पर आगे कहा है, 'दूसरे पक्ष के नेता या कार्यकर्ता के निजी जीवन और सार्वजनिक कार्यक्रम से असंबंधित बातों की आलोचना नहीं की जा सकती। दूसरे पक्ष या उनके कार्यकर्ताओं पर साबित न हुए आरोपों पर आलोचना नहीं कर सकते।'

एक और महत्वपूर्ण नियम ये है के 'किसी भी उम्मीदवार या उम्मीदवारों के प्रचार में किए जा रहे कार्यक्रम का खर्चा संबंधित उम्मीदवार द्वारा किया जा रहा है ऐसा लिखित दस्तावेज़ भारतीय संविधान की धारा ७-एच के तहत डिस्ट्रिक्ट इलेक्शन ऑफिसर के पास ४८ घंटे के अंदर जमा करना अनिवार्य है। इसके उल्लंघन में संबंधित उम्मीदवार पर कार्यवाही की जा सकती है।'

भाजपा ये कह कर इससे बच सकती है के वे इस फ़िल्म या वेब-सीरीज़ के निर्माता नहीं हैं। हालांकि भाजपा का इस फ़िल्म से कोई भी सीधा संबंध नहीं है, मगर भाजपा के राष्ट्रिय अध्यक्ष अमित शाह इस फ़िल्म के दूसरे पोस्टर का अनावरण बुधवार को करनेवाले थे। पर गोवा के मुख्यमंत्री मनोहर पार्रिकर के अकस्मात निधन की वजह से इस कार्यक्रम को आगे ढकेल दिया गया।

बमन इरानी रतन टाटा की भूमिका में

भले ही भाजपा का इस फ़िल्म से कोई सीधा संबंध नहीं है, मगर इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता के ये फ़िल्म पक्ष की प्रतिमा को और उजागर करने का माध्यम बनेगी, क्यूंकि मोदी को भाजपा से अलग नहीं देखा जा सकता। फ़िल्म के माध्यम से प्रधानमंत्री की लोकप्रियता और व्यक्तित्व को बढ़ाने में और सहायता मिलेगी इसमें कोई दो राय नहीं।

पक्ष के लिए फ़िल्म के माध्यम से पक्ष का चेहरा चर्चा में रहना फायदेमंद है। भाजपा का चुनाव चिन्ह और झंडा इस फ़िल्म में कुछ जगहों पर इस्तेमाल होना स्वाभाविक है। इससे आचार संहिता का स्वाभाविक उल्लंघन हो सकता है। आचार संहिता के अनुसार 'विज्ञापन की चीजों में –

१. सत्तापक्ष का नाम कहीं पर भी आना नहीं चाहिए।

२. विपक्ष के मतों या काम की सीधी आलोचना नहीं की जानी चाहिए।

३. किसी भी पक्ष के प्रतिक, चुनाव चिन्ह, झंडे का इस्तेमाल नहीं होना चाहिए।

४. पक्ष या उम्मीदवार को लोगों का सहयोग मिले इस तरीकेसे प्रभावित नहीं करना चाहिए।

आचार संहिता का एक और महत्वपूर्ण नियम है के 'इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट मिडिया में सरकारी तिजोरी के खर्चे से ऐसा कोई भी विज्ञापन नहीं आना चाहिए जिसमे सरकार की सफलताओं का ज़िक्र किया गया हो।'

फ़िल्म या वेब-सीरीज़ के निर्माण में भाजपा या सरकार का कोई भी संबंध नहीं होने के कारण सरकारी तिजोरी का कोई संबंध भी नहीं आता है। पर दोनों जगहों में अप्रत्यक्ष रूप से सत्ता पक्ष के विज्ञापन या प्रचार की संभावना है।

इस बारे में पूछने पर चुनाव आयोग के वरिष्ठ अधिकारी ने बताया, "जब तक हमारे पास ऐसी कोई शिकायत नहीं आती, हम कुछ नहीं कह सकते।"

राजकीय विशेषज्ञ तथा साउथ एशियन मॉनिटर के कार्यकारी संपादक चंदन नंदी ने सिनेस्तान से किये हुए टेलीफोनिक संभाषण में कहा, "मुझे ये पुरे तरीकेसे गलत और अनैतिक लगता है। आप ऐसा नहीं कर सकते क्यूंकि ये सीधे आचार संहिता के विरुद्ध है।"

नंदी का कहना है के लोगों पर राजकीय बायोपिक्स या राजकीय माहौल की फ़िल्मों का असर हो सकता है। "आपने ये पद्मावत (२०१८) के प्रदर्शन के वक़्त भी देखा था। इस फ़िल्म में भी प्रभावित करने के अंश अवश्य होंगे क्यूंकि पाकिस्तान पर किये गए हवाई हमले के कुछ समय बाद ही ये फ़िल्म प्रदर्शित होगी। इससे प्रधानमंत्री के खाते में एक और उपलब्धि का इज़ाफा हुआ ऐसा माना जाता है। ऐसी तकनीक का उपयोग लोकतंत्र के लिए अच्छा चिन्ह नहीं है। चुनाव आयोग के स्वामित्व के बारे में भी सवाल उठने चाहिए," उन्होंने कहा।

नंदी ने कहा के इससे पूर्व भी राजकीय विषयों पर फ़िल्में हुई हैं और इस पर उन्होंने गुलज़ार की आंधी (१९७५) का उदाहरण दिया, जिसके बारे में कहा जाता था के फ़िल्म अंशतः इंदिरा गांधी के जीवन पर आधारित थी। पर उनका कहना है के वो अलग समय था।

"मुझे नहीं लगता के समाज इतना बंटा हुआ था के उसका चुनाव पर कोई प्रभाव पड़ता," नंदी ने कहा। "पर यहाँ समाज पहले से ही बंटा हुआ है, जहाँ सत्ता पक्ष गैर मुद्दों से भी काफ़ी फायदा उठा रहा है। मेरे दिमाग में यह सवाल उठता है के क्या पी एम या भाजपा इतने चिंतित हैं के उन्हें ऐसे तरीके इस्तेमाल करने पड़ रहे हैं जिससे पी एम की लोकप्रियता बढे।"

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