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नोबलमेन पोस्टर – कुणाल कपूर, अली हाजी की फ़िल्म में उठाया धौंसियाने का मुद्दा


वंदना कटारिया की यह निर्देशकीय पहली फ़िल्म २८ जून को प्रदर्शित हो रही है।

Sonal Pandya

प्रॉडक्शन डिज़ाइनर से निर्देशक बनी वंदना कटारिया की पहली फ़िल्म का नया पोस्टर और प्रदर्शन की तारीख जारी की गई है। इस सायकोलॉजिकल ड्रामा में कुणाल कपूर, नया चेहरा अली हाजी, मोहम्मद अली मीर, मुस्कान जाफरी, शान ग्रोवर और सोनी राज़दान काम कर रहे हैं। फ़िल्म २८ जून को प्रदर्शित होगी।

मसूरी के मान्यताप्राप्त बोर्डिंग स्कुल में ये कहानी घटती है, जिसमे छात्रों को धौंसियाने और परेशान करने का महत्वपूर्ण मुद्दा उठाया गया है। पोस्टर में कुणाल कपूर एक शिक्षक की भूमिका में नज़र आ रहे हैं और पीछे बोर्ड पर 'धौंसियाना गलत है' (बुलियिंग इज़ बॅड) ये बार बार लिखा गया है।

एक छात्र, जिसकी भूमिका अली हाजी ने निभाई है, वो भी पोस्टर में दिखता है। पोस्टर में निचे से ऊपर उसे उल्टा दर्शाया गया है, जो अपनी परेशानियों में डूबता नज़र आ रहा है और उसके गाल पर ज़ख़्म भी स्पष्ट दिखाई देता है।

पोस्टर के ऊपरी हिस्से में हैशटैग दिखाई देता है जिसमे लिखा है बू द बुली। एक १५ साल के लड़के शाय को बोर्डिंग स्कुल के बाकि छात्रों द्वारा चिढ़ाया और तंग किया जाता है जब उसे फ़ाऊंडर्स डे के प्रॉडक्शन विलियम शेक्सपियर लिखित द मर्चंट ऑफ़ वेनिस में मुख्य भूमिका मिलती है।

फ़िल्म की ताज़ा जानकारी देते हुए कटारिया ने एक प्रेस रिलीज़ में कहा, "ये एक सायकोलॉजिकल ड्रामा है जिसमे छोटी उम्र में धौंसियाने का बच्चों के दिमाग पर क्या असर होता है, इस विषय को उठाने की कोशिश की गई है। यूडली फ़िल्म्स के साथ इस फ़िल्म को बनाने का ये सफर काफ़ी अच्छा रहा है और मैं काफ़ी उत्सुक हूँ के दर्शक हमारे परिश्रम को कैसा प्रतिसाद देते हैं।"

ऐजाज़ ख़ाँ की हामिद (२०१९) के बाद यूडली फ़िल्म्स की २०१९ में प्रदर्शित हो रही ये दूसरी फ़िल्म है। मानव कॉल अभिनीत म्युज़िक टीचर को भी यूडली फ़िल्म्स ने नेटफिल्क्स पर प्रदर्शित किया था।

"हम ऐसी फ़िल्में बनाने के लिए कटिबद्ध हैं जो हमारे सामाजिक संदर्भ से जुडी हुई हों, जो दर्शकों को बाँध सके और उनका मनोरंजन भी कर सके," निर्माता सिद्धार्थ आनंद कुमार ने कहा। "नोबलमेन में बढ़ती उम्र के बच्चों के गंभीर विषय को प्रस्तुत किया गया है, जहाँ धौंसियाने जैसे कटु सत्य के साथ ये युवा कैसे जीते हैं ये दर्शाया गया है। ये बड़ी मान्यताप्राप्त संस्थाओं में भी होता है और इसका सामना उन्हें उम्र भर करना पड़ता है।"

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