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नो फादर्स इन कश्मीर गाना 'चोल होमा रोशाय' – हब्बा ख़ातून के बोल को मिला नया अंदाज़


लॉईक ड्यूरी और क्रिस्टोफ मिंक द्वारा संगीतबद्ध इस गाने को अली सैफुद्दीन ने गाया है।

Shriram Iyengar

पिछले कई वर्षों से सूफी संगीत और कश्मीरी गीतों का प्रभाव हिंदी फ़िल्म संगीत पर दिखाई पड़ता है। पर नो फादर्स इन कश्मीर उस कवी के पास वापस पहुंचा जो गीतों के बोल को कश्मीरी संगीत में ढालता है। 'चोल होमा रोशाय' ये गाना १६वि शताब्दी की कवयित्री हब्बा ख़ातून की कविता है और इस ज़माने के झंकार के अंदाज़ के साथ इसे पेश किया गया है। निर्देशक अश्विन कुमार की फ़िल्म का ये गाना हालही में जारी किया गया।

गाने के दृश्यों में टीनेज रोमांस की झलकियां दिखती हैं। माजिद (शिवन रैना) लन्दन रिटर्न नूर (ज़ारा वेब्ब) का दीवाना है। उनकी मासूमियत को देख कर हम भी खुश होते हैं। पर उनकी मासूमियत के पीछे दुःख भी छुपा है, क्यूंकि दोनों अपने अपने खोए हुए पिता को ढूंढ रहे हैं। गाने में भी यही भाव झलकतें है।

हब्बा ख़ातून उनके दर्द भरे नग्मों के लिए मशहूर थीं। यहाँ इस १६वि सदी की कवयित्री के बोल को गिटार के संगीत के साथ पेश किया गया है। क्रिस्टल बास्केट के साथ इलेक्ट्रिक गिटार का संगीत अली सैफुद्दीन की आवाज़ में इस गीत को गति और रिदम दोनों प्रदान करते हैं।

देखा जाए तो अली सैफुद्दीन संगीतकार लॉईक ड्यूरी और क्रिस्टोफ मिंक को कभी नहीं मिले। संगीतकारों ने कश्मीरीयत का भाव रखने के लिए अली की आवाज़ को संगीत के साथ मिक्स किया है। इस संगीत में इस्तेमाल किया गया क्रिस्टल बास्केट ये वाद्य आजकल मुश्किल से इस्तेमाल होता है। 'रोशाय' की मेलोडी फ़िल्म के सॉउंडट्रैक की मुख्य कड़ी है और फ़िल्म के कई स्तरों को उजागर करती है। इस गाने को दोबारा लन्दन के पर्किन्स सिस्टर्स ने गाया जो के 'रोशाय' गाने का एक और वर्जन है।

सैफुद्दीन का गाना सादा, सरल लेकिन बेहद प्रभावी है। उनकी आवाज़ में ऐसी गहराई है के आप उसमे खो जाते हैं। नो फादर्स इन कश्मीर ५ अप्रैल को प्रदर्शित हो गई।   

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